21 नवंबर को
मेरे साले अंकित(गाँव भैंसवाल कलां,
सोनीपत) से फोन
पे बात हुई
और बातों ही
बातों में कहीं
घूमने-फिरने को
जाने का प्लान
बनने लगा ।
अंकित इंडियन एयरफोर्स में
कार्यरत है और उस
समय छुट्टी पे
घर आया हुआ
था। अंकित और
उसकी पत्नी रेनू
हमारे साथ पिछले
साल हरिद्वार, ऋषिकेश
घूमने गए थे
तो इस बार
अंकित बोला कि
पहाड़ों को छोड़कर
कहीं भी घूमने
चलो । अब
तक हमने राजस्थान की
और कोई यात्रा
नहीं की थी
तो इस बार
राजस्थान जाना तय हुआ
।
मैंने और मेरे दोनों छोटे भाइयों सोनू और सुनील ने काफी तिकड़मबाजी कर के जयपुर, आगरा, मथुरा और वृन्दावन घूमने का प्लान बनाया । हमारे पास Chevorlet Beat कार है जिसमे चलाने वाले सहित 5 सवारी ही बैठ सकती हैं । लेकिन घूमने जाने वाले हो गए 6+3 (मैं, मेरी बीवी नवीन, मेरे बच्चे हिमांक 5 वर्ष, मीनल 2 वर्ष, सोनू, सुनील, अंकित, रेनू और उनकी बच्ची लिसा 1 वर्ष)।
सुनील ने अपने एक मित्र से उसकी 7 सीटर गाड़ी ले जाने को पूछा लेकिन गाड़ी नहीं मिली । एक-दो मित्र को ओर पूछा लेकिन 7 सीटर गाड़ी नहीं मिली । फिर हमने अपनी 5 सीटर गाड़ी में पिछली सीट 4 जनों ने बैठकर देखा लेकिन एडजस्ट नहीं हो पाए । अगर किराये की गाड़ी कर के ले जाते तो हमें वो बहुत महंगी पड़ती क्योंकि हमारा प्लान वीरवार 28 नवंबर शाम को पानीपत से चलकर रविवार 1 दिसम्बर शाम को वापसी का था । 28 नवंबर को सुबह ऑफिस जाते हुए मैंने सोनू को बोल दिया कि अंकित को बता देना कि 7 सीटर गाड़ी नहीं मिली इसीलिए घूमने जाना कैंसिल हो गया है ।
दोपहर को मुझे पता चला कि अंकित और रेनू पानीपत आ चुके हैं। अंकित ने तो अपने फौजी कोटे से सैनिक विश्राम गृह, जयपुर में 3 कमरे भी आरक्षित कर दिए।
अब मैंने भी अपनी छुट्टी की अर्जी दी दी और शाम को घर पहुंचा । शाम 7:45 बजे हमने chevorlet beat की डिग्गी में 3 बड़े बैग और 2 छोटे बैग रख लिए।
सुनील ने ड्राइविंग सीट संभाली और सोनू आगे वाली सीट पे हिमांक को लेकर बैठ गया । बाकी सब पीछे वाली सीट पे फंस लिए। घर से निकलते हुए मैंने एक डबल बेड वाला कम्बल और एक बड़ा तकिया साथ ले लिया था ताकि रास्ते में ठंड लगने पर ये काम आ जाएं। फिर मैंने थोड़ा दिमाग लगाया। आगे वाली दोनों सीटों के बीच में मैंने कम्बल को तह कर के उसके ऊपर तकिया रख दिया और एक गद्देदार अस्थायी सीट तैयार हो गयी। अंकित बड़े ही आराम से उस सीट पे बैठ गया और पूरे टूर में वो उसकी पसंदीदा सीट रही। पानीपत से हमने रोहतक वाला रास्ता लिया और रात को 2 बजे के करीब जयपुर पहुँचे।
सुबह उठकर सैनिक विश्राम गृह की कैंटीन में हमने चाय-नाश्ता किया और जयपुर घूमने के लिए गाड़ी के पास पहुंचे उस समय वहां पर तीन चार बंदे भी खड़े थे I उनमें से एक बोला कि आप लोग इस छोटी सी गाड़ी में कैसे आ गए मैं बोला कि भाई यह हिंदुस्तान है यहां जुगाड़ चलता है फिर वह बंदा बोला कि इतने सारे बंदों को गाडी में बिठाने पर में आपका चालान कट जाएगा और भी काफी तरह से उसने हमें बरगलाने की कोशिश की बाद में हमें पता चला कि वह बंदा किराए पर गाड़ी चलाता है और इसीलिए हमारे पीछे पड़ा हुआ था ताकि हम उसकी गाड़ी किराए पर लेकर जाएं घूमने फिरने के लिए ।
मैंने और मेरे दोनों छोटे भाइयों सोनू और सुनील ने काफी तिकड़मबाजी कर के जयपुर, आगरा, मथुरा और वृन्दावन घूमने का प्लान बनाया । हमारे पास Chevorlet Beat कार है जिसमे चलाने वाले सहित 5 सवारी ही बैठ सकती हैं । लेकिन घूमने जाने वाले हो गए 6+3 (मैं, मेरी बीवी नवीन, मेरे बच्चे हिमांक 5 वर्ष, मीनल 2 वर्ष, सोनू, सुनील, अंकित, रेनू और उनकी बच्ची लिसा 1 वर्ष)।
सुनील ने अपने एक मित्र से उसकी 7 सीटर गाड़ी ले जाने को पूछा लेकिन गाड़ी नहीं मिली । एक-दो मित्र को ओर पूछा लेकिन 7 सीटर गाड़ी नहीं मिली । फिर हमने अपनी 5 सीटर गाड़ी में पिछली सीट 4 जनों ने बैठकर देखा लेकिन एडजस्ट नहीं हो पाए । अगर किराये की गाड़ी कर के ले जाते तो हमें वो बहुत महंगी पड़ती क्योंकि हमारा प्लान वीरवार 28 नवंबर शाम को पानीपत से चलकर रविवार 1 दिसम्बर शाम को वापसी का था । 28 नवंबर को सुबह ऑफिस जाते हुए मैंने सोनू को बोल दिया कि अंकित को बता देना कि 7 सीटर गाड़ी नहीं मिली इसीलिए घूमने जाना कैंसिल हो गया है ।
दोपहर को मुझे पता चला कि अंकित और रेनू पानीपत आ चुके हैं। अंकित ने तो अपने फौजी कोटे से सैनिक विश्राम गृह, जयपुर में 3 कमरे भी आरक्षित कर दिए।
अब मैंने भी अपनी छुट्टी की अर्जी दी दी और शाम को घर पहुंचा । शाम 7:45 बजे हमने chevorlet beat की डिग्गी में 3 बड़े बैग और 2 छोटे बैग रख लिए।
सुनील ने ड्राइविंग सीट संभाली और सोनू आगे वाली सीट पे हिमांक को लेकर बैठ गया । बाकी सब पीछे वाली सीट पे फंस लिए। घर से निकलते हुए मैंने एक डबल बेड वाला कम्बल और एक बड़ा तकिया साथ ले लिया था ताकि रास्ते में ठंड लगने पर ये काम आ जाएं। फिर मैंने थोड़ा दिमाग लगाया। आगे वाली दोनों सीटों के बीच में मैंने कम्बल को तह कर के उसके ऊपर तकिया रख दिया और एक गद्देदार अस्थायी सीट तैयार हो गयी। अंकित बड़े ही आराम से उस सीट पे बैठ गया और पूरे टूर में वो उसकी पसंदीदा सीट रही। पानीपत से हमने रोहतक वाला रास्ता लिया और रात को 2 बजे के करीब जयपुर पहुँचे।
सुबह उठकर सैनिक विश्राम गृह की कैंटीन में हमने चाय-नाश्ता किया और जयपुर घूमने के लिए गाड़ी के पास पहुंचे उस समय वहां पर तीन चार बंदे भी खड़े थे I उनमें से एक बोला कि आप लोग इस छोटी सी गाड़ी में कैसे आ गए मैं बोला कि भाई यह हिंदुस्तान है यहां जुगाड़ चलता है फिर वह बंदा बोला कि इतने सारे बंदों को गाडी में बिठाने पर में आपका चालान कट जाएगा और भी काफी तरह से उसने हमें बरगलाने की कोशिश की बाद में हमें पता चला कि वह बंदा किराए पर गाड़ी चलाता है और इसीलिए हमारे पीछे पड़ा हुआ था ताकि हम उसकी गाड़ी किराए पर लेकर जाएं घूमने फिरने के लिए ।
पहले हम हवामहल
पहुंचे हवामहल के
बाहर काफी भीड़भाड़ थी
हमने वहां कुछ
फोटोग्राफी की और आगे
निकल लिए
क्योंकि हम काफी सुबह सुबह निकल पड़े थे उस समय ज्यादातर जगह अभी खुली नहीं थी तो हम नाहरगढ़ किले पर पहुंचे। अगर मौसम साफ हो तो नाहरगढ़ किले से पूरा जयपुर नज़र आता लेकिन उस दिन थोड़ी धुंध छायी हुई थी ।
नाहरगढ़ से वापसी में हम जलमहल रुके। वहां से चिड़ियाघर जाने का प्लान बना। जयपुर में दो चिड़ियाघर हैं । जो चिड़ियाघर जयपुर शहर के अंदर है उसमें सिर्फ चिड़िया ही हैं ये हमें वहीं पहुंचकर पता चला और दूसरा नाहरगढ़ चिड़ियाघर है जिसमें शेर, तेंदुआ, टाइगर इत्यादि जानवर हैं। बच्चों को तो शेर देखना था इसीलिए वहाँ अंदर नहीं गए और नजदीक ही बिरला मंदिर पहुंच गए। अभी गाड़ी को पार्किंग में लगा ही रहे थे कि पता चला कि बिरला मंदिर शाम 4 बजे पुनः खुलेगा। टाइम देखा तो 2 बजे थे । बिरला मंदिर से हम सीधे नाहरगढ़ चिड़ियाघर पहुंचे । नाहरगढ़ चिडियागढ़ काफी बड़ा और बढ़िया लगा काफी देर तक वहां पिंजरे में कैद जानवरों को देखने के बाद हम बाहर निकले ।
एक ढाबे पर खाना खाकर आमेर किले पर पहुंचे। उस समय काफी शाम हो चुकी थी तो हमने किले के अंदर जाने की बजाए किले के बाहर जलाशय के किनारे से ही किले को निहारा और फिर सैनिक विश्राम गृह में पहुंचकर विश्राम कियाक्योंकि हम काफी सुबह सुबह निकल पड़े थे उस समय ज्यादातर जगह अभी खुली नहीं थी तो हम नाहरगढ़ किले पर पहुंचे। अगर मौसम साफ हो तो नाहरगढ़ किले से पूरा जयपुर नज़र आता लेकिन उस दिन थोड़ी धुंध छायी हुई थी ।
नाहरगढ़ से वापसी में हम जलमहल रुके। वहां से चिड़ियाघर जाने का प्लान बना। जयपुर में दो चिड़ियाघर हैं । जो चिड़ियाघर जयपुर शहर के अंदर है उसमें सिर्फ चिड़िया ही हैं ये हमें वहीं पहुंचकर पता चला और दूसरा नाहरगढ़ चिड़ियाघर है जिसमें शेर, तेंदुआ, टाइगर इत्यादि जानवर हैं। बच्चों को तो शेर देखना था इसीलिए वहाँ अंदर नहीं गए और नजदीक ही बिरला मंदिर पहुंच गए। अभी गाड़ी को पार्किंग में लगा ही रहे थे कि पता चला कि बिरला मंदिर शाम 4 बजे पुनः खुलेगा। टाइम देखा तो 2 बजे थे । बिरला मंदिर से हम सीधे नाहरगढ़ चिड़ियाघर पहुंचे । नाहरगढ़ चिडियागढ़ काफी बड़ा और बढ़िया लगा काफी देर तक वहां पिंजरे में कैद जानवरों को देखने के बाद हम बाहर निकले ।
क्रमश:

















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