अपने ऑफिस के मित्र दीपक के साथ मिलकर मैं 2-3 महीने से वैष्णो देवी की
यात्रा करने का प्लान बना रहा था । लगभग हर दिन ऑफिस में इस बात पर चर्चा
हो जाती थी । आख़िरकार अप्रैल 2017 में जाना तय हुआ । यात्रा से कुछ दिन
पहले ऑफिस के एक सहकर्मी सुमित ने भी साथ चलने की इच्छा जताई और 4-5 दिन
पहले सुमित ने बताया कि उसका भाई भी साथ में चलेगा । अब अप्रैल में किस
दिन जाएं इस मसले को भी हल किया गया । छुट्टी वगेरा का हिसाब लगा के 14
अप्रैल 2017 का दिन तय किया गया
हमारा प्लान ट्रेन से जाने का था और इसके लिए हमने कोई आरक्षण भी नहीं
करवा रखा था । 14 अप्रैल 2017 को हमने उत्तर संपर्क क्रांति की सामान्य
श्रेणी की टिकट ली । यह ट्रेन दिल्ली से चलकर रात 10:05 बजे पानीपत
पहुंचती है। हम लगभग 1 घंटा पहले ही स्टेशन पर पहुँच गए । अपने निर्धारित
समय पर ट्रेन आयी और हम सामान्य श्रेणी के डिब्बे में सवार हो लिए ।
डिब्बा यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था।
लोग डिब्बे के फर्श पर अख़बार और चादर बिछा कर लेटे हुए थे । किसी तरह जगह
बनाते हुए हम अंदर की तरफ घुसे । हमने देखा की ऊपर वाली सीटों पे लोग
लेटे हुए थे । हमने उनसे कहा कि भाई थोड़ा सा सहयोग करो और हमे भी बैठने
दो तो वो गुस्से से बोले कि नहीं हम तो पीछे से ही लेटकर आ रहे हैं और
आगे तक लेटकर ही जायेंगे । अब ये बात सुनकर हमे भी गुस्सा आ गया । मैंने
कहा की भाई ये सामान्य श्रेणी का डिब्बा है स्लीपर क्लास का नहीं जो तुम
एक सीट पर एक ही लेटकर जाओगे । हमारे ऐसे कहते ही बाकि यात्री भी हमारी
तरफ से बोलने लगे । अब तो सोने वालों को जागना पड़ा । हम भी उन के साथ ऊपर
वाली सीटों पर बैठ गए । अम्बाला तक तो बैठे रहे । अम्बाला से निकलने के
बाद नींद आने लगी तो हम भी बाकियों के साथ तालमेल करके लेट गए । जब आँख
खुली तो देखा कि ट्रेन कठुआ पार कर चुकी है । तब तक नीचे वाली सीट भी
खाली हो चुकी थी । हम भी नीचे वाली सीट पे बैठ गए और ट्रेन की खिड़की से
बाहर के नज़ारों को निहारते हुए लगभग 8:50 बजे कटरा पहुँच गए । यात्रियों
की सुविधा के लिए कटरा रेलवे स्टेशन पर भी यात्रा पर्ची का काउंटर बना
हुआ है लेकिन मैंने माता वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए जरूरी यात्रा
पर्ची ऑनलाइन ही आरक्षित करवा के उसका प्रिंट निकाल लिया था ।
ज्यादातर यात्री कटरा पहुँचते ही किसी होटल या धर्मशाला में विश्राम करते
हैं । लेकिन हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था । मैं अब तक लगभग 12-13 बार
वैष्णो देवी की यात्रा कर चुका हूँ लेकिन सिर्फ 2-3 बार ही यात्रा शुरू
करने से पहले किसी होटल में विश्राम किया है अन्यथा कटरा में पहुँचते ही
माता के भवन की यात्रा शुरू कर दी जाती है । इस बार भी इरादा कुछ ऐसा ही
था ।
रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही हम एक ऑटोरिक्शा में बैठ कर सीधे बाणगंगा
पहुंचे । वहां से पैदल माता के भवन की यात्रा शुरू कर दी।
दर्शनी दरवाजे से निकलते ही घोड़े-खच्चर वाले यात्रियों की परेशानी बढ़ाने
का पूरा-पूरा ख्याल रखते हैं । जगह-जगह घोड़ों की लीद बिखरी रहती है ।
घोड़ों को इतनी तेजी से भगाते हुए लाते हैं कि यात्रियों को बचने के लिए
रास्ते के साथ लगी सुरक्षा बाड़ से चिपकना पड़ जाता है । ये मारा-मारी वैसे
तो पूरे रास्ते बनी रहती है लेकिन अर्धकुंवारी से थोड़ा पहले जो नया
रास्ता माता के भवन को जाता है उस पर घोड़े-खच्चर का आना-जाना प्रतिबंधित
है । इसीलिए वहां जाकर इनसे छुटकारा मिलता है ।
रात को ट्रेन में खाने के लिए हम घर से परांठे भी लाये थे । लेकिन ट्रेन
में वो खाये न जा सके । इसीलिए लगभग 2 किलोमीटर की चढाई के बाद हमने एक
चाय की दुकान पे बैठ कर परांठों को निपटाया गया ।
सुमित हम सब में थोड़ा ज्यादा वजनदार था इसीलिए वो आराम-आराम से चल रहा था
और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर उसे रुकना पड़ रहा था । इसी चक्कर में मैं और दीपक
आगे निकाल गए और सुमित अक्षत एक साथ पीछे रह गया । हम माता के भवन को
जाने वाले नए रास्ते पे चल दिए जोकि पुराने वाले रास्ते कि अपेक्षा अधिक
सुविधाजनक है | हालाँकि अर्धकुंवारी से भी एक रास्ता थोड़ा सा चल कर नए
रास्ते से मिल जाता है । एक जगह रुक कर हमने सुमित और अक्षत का इंतज़ार
किया लगभग आधे घंटे के बाद वो दोनों आये और हम फिर से आगे बढ़ चले । भवन
जाने वाले नए रास्ते पर खानपान के लिए वैष्णो देवी ट्रस्ट के भोजनालय भी
हैं जहाँ पर उचित दामों पर खाने-पीने की वस्तुएं मिलती हैं । रास्ते में
हिमकोटी नामक जगह आती है । वहां से मैं और दीपक फिर से आगे निकल गए ।
ऑनलाइन यात्रा पर्ची का फायदा ये हुआ कि जब यात्रा शुरू करते हैं तो
हमारी पर्ची देख कर पर्ची स्कैन करने वाला बिना स्कैन किये बोला ...ओके
है ...जाओ आगे । इसीलिए हमे कहीं भी पर्ची स्कैन करवाने के लिए लाइन में
नहीं लगना पड़ा सिवाय ऊपर भवन पर पहुंचने तक । मैं और दीपक जल्दी-जल्दी
चलते हुए माता के भवन पहुँच गए |
वहां पर पहुंचकर सबसे पहले हमने ठंडे-ठंडे पानी से स्नान किया और फिर
अपना सामान जमा करवाने के लिए लॉकर रूम की तरफ गए । वहां पर काफी लम्बी
लाइन लगी हुई थी । हमने लॉकर लेने का विचार त्याग दिया । फिर हम सूचना
केंद्र पर पहुंचे और वहां से सुमित और अक्षत के नाम की घोषणा करवाई ताकि
वो भी हमारे पास पहुँच जाएँ । लगभग एक घंटे के बाद वो दोनों आये । दोनों
काफी थके हुए लग रहे थे इसीलिए हमने आपस में सलाह कर के ये तय किया कि
पहले मैं और दीपक दर्शन कर के आते हैं । उसके बाद सुमित और अक्षत । अपना
सामान उन दोनों को देकर हम माता के दर्शनों के लिए लाइन में लग लिए और
लगभग 45 मिनट के बाद माता के पिंडी रूप के दर्शन करके वापिस आ गए । हमारे
आने के बाद सुमित और अक्षत भी जल्दी ही दर्शन करके आ गए । अब तक भूख भी
लग चुकी थी लेकिन भोजनालयों में भीड़ थी इसीलिए कुछ बिस्कुट और जूस से काम
चलाया और भैरों मंदिर की ओर चल दिए । माता के आशीर्वाद के अनुरूप कोई
भक्त अगर माता के दर्शनों के उपरांत अगर भैरों के दर्शन नहीं करता तो
उसकी यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती । भैरों मंदिर माता के भवन से 2
किलोमीटर की कठिन चढाई के बाद आता है । भैरों मंदिर की ओर जाने वाले
रास्ते में घोड़ों की भरमार थी इसीलिए हम सीढ़ियों वाले रास्ते से होते हुए
भैरों मंदिर पहुँच गए । रास्ते में हमने देखा कि माता के भवन से भैरों
मंदिर तक पहुँचने के लिए रोपवे का निर्माण कार्य चल रहा था । भैरों मंदिर
में दर्शन करके हम सांझी छत की ओर से नीचे उतरने लगे । इस बार भी मैं और
दीपक आगे निकल गए । थोड़ा आगे चलने के बाद एक सीढ़ियों वाले छोटे रास्ते से
दीपक मुझसे आगे निकल गया जिसका मुझे पता भी नहीं चला । मैं तो ये सोच रहा
था कि वो मुझसे पीछे रह गया है । खैर सांझी छत पहुँच कर मैंने उसका
इंतज़ार किया ।
लगभग आधे घंटे के बाद सुमित और अक्षत आये । वो दोनों तो हमसे काफी पीछे
थे इससे ये तो पता चल गया कि दीपक आगे निकल गया है लेकिन कितना आगे ये
नहीं पता । जम्मू कश्मीर में बाहरी कोई भी प्रीपेड सिम नहीं चलता सिर्फ
पोस्टपेड चलता है । हम चारों में से सिर्फ मेरे पास ही पोस्टपेड कनेक्शन
था । मैं दीपक को ढूंढ़ने के लिए तेजी से नीचे की ओर उतरने लगा । मन में
थोड़ा सा भय भी उत्पन्न हो रहा था दीपक को लेकर । अर्धकुंवारी से थोड़ा
नीचे उतरते ही मेरे मोबाइल की घंटी बजी । लेकिन फ़ोन करने वाले की आवाज
साफ़ नहीं आ रही थी और फ़ोन कट गया । फिर जब मैंने अपने नंबर से मिलाया तो
नहीं मिला । मैं जल्दी-जल्दी नीचे उतरता रहा
धीरे-धीरे कटरा नजदीक आता जा रहा था । मैं ओर जल्दी नीचे उतरने के लिए
रास्ते की अंतिम सीढ़ियों पे चल पड़ा जोकि बाणगंगा के पास पहुंचती हैं ।
अभी मैं कुछ सीढ़ी ही नीचे उतरा था कि मोबाइल की घंटी फिर से बजी और इस
बार बात हुई । फ़ोन दीपक ने किया था किसी के मोबाइल से । इतफ़ाक़ से वो
मुझसे थोड़ा सा पीछे था और फ़ोन पे बात होने के बाद जल्दी ही मेरे पास
पहुँच गया । अब जाकर राहत की साँस आयी । फिर हम दोनों नीचे उतरते चले गए
और दर्शनी दरवाजे के पास पहुँच के सुमित और अक्षत का इंतज़ार करने लगे ।
लगभग 2 घंटे के बाद वो दोनों आये । वहां से हम ऑटो में बैठकर बसस्टैंड पर
पहुंचे |
तब तक रात के 9 बज चुके थे । इस समय कोई ट्रेन तो थी नहीं इसीलिए कटरा
बाजार से प्रसाद वगैरा ले कर हमने पानीपत के लिए बस का पता किया । पता
चला कि इस समय कोई भी बस नहीं है सीधे पानीपत जाने के लिए । एक बस वाला
बोला कि जम्मू चले जाओ । वहां से काफी बसें मिल जाएँगी । एक बस में बैठकर
हम लगभग 11 बजे जम्मू बसस्टैंड पहुंचे । वहां से भी कोई सीधी बस नहीं मिल
रही थी । सब लुधियाना तक जा रही थी हमने लुधियाना जाने वाली बस के
कंडक्टर से पूछा तो वो बोला कि अभी तो कोई सीट तो खाली नहीं है लेकिन आप
लोग बस के केबिन में बैठ जाना । किराया 300/- रूपये प्रति सवारी । मैं
बोला कि हम काफी थके हुए हैं इसीलिए नींद आएगी तो उसने मना कर दिया ।
बोला कि केबिन में सोना नहीं है ।
एक तो पहले ही थके हुए थे रात का समय और ऊपर से बस भी नहीं मिल रही थी ।
सोचा कि रात को रुकने के लिए किसी होटल में रूम ले लेते हैं और सुबह
ट्रेन से जायेंगे ।
फिर दिमाग को दौड़ाया और अनुमान लगाया कि रेलवे स्टेशन पे चलते हैं और
वहां प्रतीक्षाकक्ष में रात गुजार लेंगे । एक ऑटो मैं बैठ कर रेलवे
स्टेशन पहुंचे । फिर से दिमाग लगाया कि 12 बज चुके हैं इसीलिए अभी टिकट
ले लेते हैं और सुबह सीधे ट्रेन मैं जा बैठेंगे । टिकट खिड़की पे पहुँच गए
। एक भला मानस बैठा हुआ था । मैंने बोला 4 टिकट दे दो सुबह जाने वाली
मालवा एक्सप्रेस की । टिकट देने वाला बोला कि पिछले 3 दिनों से स्पेशल
ट्रेन चल रही है और अभी कटरा से आ रही है जोकि आनंद विहार जाएगी अम्बाला
से होते हुए । हमारी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा ।
हमने अम्बाला के चार टिकट लेकर उसको धन्यवाद बोला और प्लेटफार्म पर आ गए
। 1:50 बजे रात को ट्रेन कटरा से आयी | हम सबसे पीछे वाले सामान्य श्रेणी
के डिब्बे के पास पहुंचे । अंदर जाने की कोई जगह नहीं दिख रही थी क्योंकि
भीड़ इतनी थी कि लोग दरवाजे पर भी लोग सोये हुए थे | हमने अपने बैग उठाये
और दौड़ते हुए ट्रेन के सबसे आगे वाले सामान्य श्रेणी वाले डिब्बे के पास
पहुँच गए । लेकिन वो भी भरा हुआ था । उससे आगे विक्लांग श्रेणी का डिब्बा
था उसमे भी काफी सवारियां बैठी हुई थी । हम भी उसमे घुस गए । अभी हम ठीक
से खड़े भी नहीं हुए थे कि अचानक से उसमे बैठी हुई सवारियों में हलचल सी
मच गयी और देखते ही देखते वो डिब्बा लगभग खाली हो गया । हमने इसका फायदा
उठाया और खाली हुई सीटों पर जम गए । अपना सामान सीट पे रखकर मैं बाहर आया
और डिब्बे से उतरे एक यात्री से पूछा कि डिब्बा क्यों खाली कर दिया तो वो
बोला कि भैया ये विक्लांग डिब्बा है ............ मैंने कहा भाईसाब
डिब्बा विक्लांग नहीं है ........विक्लांगों के लिए है और इतनी रात को
शायद ही कोई इसमें आएगा इसीलिए चाहो तो बैठ सकते हो । वो तो वापिस डिब्बे
में आ गया लेकिन उसके साथ वाले नहीं आये और अच्छा हुआ नहीं आये क्योंकि
अम्बाला तक हम उसमे आराम से लेटकर सोते हुए आये
ट्रेन ने 16 अप्रैल को सुबह 8:30 बजे के करीब अम्बाला पहुंचा दिया । वहां
से दीपक ट्रेन से पानीपत पहुंचा और बाकि हम बस से पानीपत पहुंचे ।
जय माता दी
कुछ ध्यान देने योग्य .............
अगर आपके पास कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध है तो ऑनलाइन ही यात्रा पर्ची के
लिए रजिस्ट्रेशन करके उसका प्रिंट निकल लें । ये ज्यादा सुविधाजनक रहता
है
जम्मू-कश्मीर में बाहरी राज्यों से आने वाले यात्रियों का सिर्फ बिल वाला
सिमकार्ड ही काम करता है इसीलिए यात्रियों की सुविधा के लिए 3 दिन की
वैधता वाला कामचलाऊ सिमकार्ड मिलता है जोकि कटरा बाज़ार से माता के भवन की
ओर जाने वाले रास्ते पर आसानी से मिल जाता है
हालाँकि बाणगंगा में स्नान करने का स्थान दर्शनी दरवाजे से पार निकलते ही
है लेकिन वहां पर घोड़ों की लीद से पानी में बहुत ज्यादा गंदगी फैली रहती
है । अगर आपको स्नान करना है तो दर्शनी दरवाजा से लगभग 1 किलोमीटर आगे
चलकर दाहिने हाथ की ओर एक झरने-नुमा जगह है ।
यात्रा में चढाई के दौरान जितना हो सके पानी पर निर्भर रहें और हल्का खाना खाएं
माता के भवन से भैरों मंदिर की ओर जाते हुए बंदरों की फ़ौज बैठी रहती जोकि
आने-जाने वाले यात्रियों से बड़े ही प्यार से हाथ में लिया हुआ सामान छीन
लेते हैं । इसीलिए कोई भी पैकेट या प्रसाद वगैरा अपने बैग में रखें और
समूह में चलें
 |
| भैरों मंदिर से माता के भवन का दृश्य |
 |
| हमारी टोली |
 |
| पराठों का निपटारा |
 |
| रास्ते में चेकिंग के लिए लगी हुई लाइन |
 |
| भैरों मंदिर की ओर |
 |
| पीछे भैरों मंदिर |
 |
| लंगूर |
 |
| दीपक & प्रदीप |
 |
| सांझी छत |