यात्रा की तैयारी
साल 2005 में दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हुए अक्सर खाली समय के दौरान मैं ऑफिस के कंप्यूटर पे पहाड़ों के नज़ारे देखता रहता था । उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा के बारे में भी उसी दौरान पता चला था । 2006 में मैंने दिल्ली से नौकरी छोड़ दी और अपने गृहनगर पानीपत में एक रिटेल कंपनी बिग बाजार में नौकरी शुरू कर ली । धीरे धीरे पहाड़ों की और लगाव बढ़ता रहा । साल में एक बार तो हरिद्वार ऋषिकेश जरूर जाता था । उस समय तो हरिद्वार ऋषिकेश तक ही अपनी पहुँच थी । फिर चार धाम यात्रा की एक वीडियो देख कर मन मचल उठा और फिर चार धाम में से किसी एक की यात्रा करने की सोचने लगा । इंटरनेट से मिली जानकारी से मुझे बद्रीनाथ की यात्रा ज्यादा शुलभ लगी ।
कुछ महीने जोड़तोड़ लगाकर बद्रीनाथ की यात्रा का प्रोग्राम बना । मैं, मेरा छोटा भाई सोनू और मेरे ताऊ का लड़का विक्की भी साथ में चलने के लिए तैयार हो गया ।
छुट्टी के लिए जद्दोजहद
यात्रा पे जाने के लिए यात्रा वाले दिन से एक दिन पहले ऑफिस में अपने मैनेजर से मैंने 6 दिनों की छुट्टी मांगी । बिग बाजार में जेन्ट्स के कपड़ों वाले डिपार्टमेंट में मेरी ड्यूटी थी । मैनेजर ने पहले तो कहा कि पागल हो गया है क्या भाई, रिटेल में इतने दिनों की छुट्टी कौन देता है । मैंने काफी रिक्वेस्ट की लेकिन मैनेजर ने मना कर दिया । हालाँकि मुझे उम्मीद थी कि छुट्टी मिल जाएगी । अगले दिन मैं ये सोच कर ऑफिस गया कि छुट्टी मिली तो जाऊंगा नहीं तो फिर कभी देखेंगे । ऑफिस में दोपहर बाद मेरे मैनेजर ने मुझसे पूछा कि कब जाना है घूमने । मैं एकदम खुश हो गया औऱ बोला कि आज शाम को जाना था । मैनेजर ने कहा कि ठीक है आज शाम तक 2500 की पैंट बेच दे औऱ छुट्टी ले ले । मैंने शाम को 7 बजे ऑफिस से निकलना था इसीलिए मेरे डिपार्टमेंट में आने वाले हर ग्राहक को बड़ी ही लगनता से अटैंड करने लगा । शाम के 6 बजे तक 1 ही पैंट बिक पाई वो भी 250 रूपये की । मुझे लगने लगा कि इस बार किस्मत में बद्रीनाथ जाना लिखा ही नहीं है । तभी एक ग्राहक जिनका नाम आनंद था, वो मेरे डिपार्टमेंट में आया । वो पहले भी काफी बार मेरे से खरीददारी करके जा चुका था इसीलिए उनके साथ मेरी अच्छी जान -पहचान हो गयी थी । उसकी कारपेट की फैक्ट्री थी पानीपत में।
उसकी एक ख़ास बात थी कि उसे प्लेट वाली पैंट बहुत पसंद थी । मैंने सोचा कि चलो एक-दो पैंट तो ये लेकर ही जायेगा । उस दिन वो अपनी बीवी औऱ लड़की के साथ आया था । आते ही मुझे बोला कि ला भाई जाटराम कुछ पैंट दिखा मैंने विदेश जाना है कुछ दिनों के लिए । मैंने उसे काफी पैंट दिखाई तो उनमे से उसे 6 पैंट पसंद आ गयी । एक पैंट का मूल्य 299 रूपये था । मेरा मैनेजर फ्लोर पे राउंड लगाने आया औऱ मुझे बोला कि हाँ भाई हुआ कुछ । इतना कह कर चला गया । आनंदजी ने मुझसे पूछा कि क्या हुआ, ये मैनेजर क्या पूछ रहा था । मैंने उसे पूरी बात बता दी
उन्होंने 4 पैंट ओर ले ली । इस तरह उनका बिलिंग अमाउंट 3000 के करीब हो गया । आनंदजी को बहुतायत धन्यवाद देते हुए मैं अपने मैनेजर के पास गया । जब उन्हें पता चला कि मैंने 10 पैंट एकसाथ बेच दी हैं तो वो बड़े खुश हुए और ख़ुशी-ख़ुशी मेरी 6 दिन की छुट्टी पास कर दी । 7:30 बजे तक मैं ऑफिस से घर पहुँच गया । ऑफिस से चलते हुए ही मैंने घर पर अपने छोटे भाई को फोन कर दिया था कि तुम लोग तैयार रहना ।
यात्रा को प्रस्थान
हमने 2 पिट्ठू बैग में एक -एक जोड़ी कपडे, तौलिया, रील वाला कैमरा इत्यादि रख लिए ।
अगर किसी यात्रा पे जाना हो तो मैं रात को ही सफर करना पसंद करता हूँ ।
रात को 8 बजे हम अपने गांव बिंझौल (जोकि पानीपत से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पे है) से पानीपत रेलवे स्टेशन जाने के लिए गांव के अड्डे पे ऑटो का इंतज़ार करने लगे । काफी देर तक कोई ऑटो वाला नहीं आया तो चिंता होने लगी कि कहीं हमारी ट्रेन ही ना निकल जाये । हालाँकि अभी ट्रेन के पानीपत पहुँचने में 2 घंटे का समय बाकी था । एकबार तो सोचा कि पैदल ही चलते हैं क्या पता रास्ते में कोई ऑटो मिल जाए । लगभग आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद हमने जैसे ही पैदल पानीपत की ओर चलना शुरू किया तभी एक ऑटो आ गया । 15 मिनट में ही हम पानीपत रेलवे स्टेशन पहुँच गए ।
मैंने पानीपत से अम्बाला तक के उत्तर संपर्क क्रांति ट्रेन के जनरल डिब्बे के 3 टिकट लिए और प्लेटफार्म पे बैठ कर ट्रेन का इंतज़ार करने लगे । लगभग 10:05 बजे ट्रेन आयी और 12 बजे तक हम अम्बाला पहुँच गए।
अम्बाला पहुँच कर पता चला कि हरिद्धार की ओर जाने वाली हेमकुंड एक्सप्रेस ट्रेन सुबह 2:50 बजे आएगी । अम्बाला से मैंने हरिद्धार तक के जनरल डिब्बे के 3 टिकट लिए औऱ प्लेटफार्म पे एक खाली सी जगह पे अखबार बिछाकर लेट गए । इस दौरान लगभग 2 घंटे की नींद भी ले ली । अपने निर्धारित समय पे ट्रेन आयी । जनरल डिब्बे में हमे ऊपर वाली सीट खाली मिल गयी औऱ आराम से सोते हुए हरिद्धार पहुंचे ।
जब ट्रेन से उतरने लगे तो मैंने एक TT से ऋषिकेश की ट्रेन के बारे में पूछा तो उसने बताया कि ये ट्रेन ऋषिकेश तक जाएगी । मैंने कहा कि हमारे पास तो हरिद्धार तक का ही टिकट था तो TT ने कहा कि कोई बात नहीं आप लोग आराम से डिब्बे में बैठ जाओ, अब कोई टिकट चेक करने नहीं आएगा । हम दोबारा ट्रेन में सवार हो गए । हरिद्धार से ऋषिकेश तक पहाड़ों के दिलकश नजारों को दिखाते हुए ट्रेन 8 बजे ऋषिकेश पहुंची ।
क्रमश:
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